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दोहा 162

162.1

चौपाई

कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।।
सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ।।
तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।।
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा।।
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी।।
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी।।
सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई।।
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला।।

162.2

दोहा/सोरठा

अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु ॥161(क)॥

162.3

दोहा/सोरठा

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ॥161(ख)॥

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