दोहा 163
163.1
चौपाई
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।।
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।।
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।।
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।।
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।।
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।।
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।
163.2
दोहा/सोरठा
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि ॥162॥