दोहा 161
161.1
चौपाई
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।।
नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदी निज भाग्य सराही।।
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई।।
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी।।
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना।।
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा।।
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती।।
सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना।।
161.2
दोहा/सोरठा
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति ॥160॥