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दोहा 121

121.1

चौपाई

ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।।
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ।।
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा।।
अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड नारि अयानी।।
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू।।
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी।।
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।।
उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता।।

121.2

दोहा/सोरठा

हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान ॥120(क)॥

121.3

दोहा/सोरठा

सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड ॥120(ख)॥

121.4

दोहा/सोरठा

सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।
सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ ॥120(ग)॥

121.5

दोहा/सोरठा

हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु ॥120॥

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