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दोहा 120

120.1

चौपाई

कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी।।
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं।।
सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं।।
राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी।।
अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं।।
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना।।
भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती।।

120.2

दोहा/सोरठा

पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि ॥119॥

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