सूक्त 14
14.1
१-२४ अथर्वा। अध्यात्मं, व्रात्यः। १ त्रिपदा अनुष्टुप्, २, ४, ६, ८, १०, १२, १४, १६, १८, २०, २२, २४ द्विपदा आसुरी गायत्री (१२, १४, १६, १८ भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप्), ३, ९ पुर उष्णिक्, ५ अनुष्टुप्, ७ प्रस्तारपङ्क्तिः, ११ स्वराड् गायत्री, १३ ,१५ आर्ची पङ्क्तिः १९ भुरिङ्नागी गायत्री, २१ प्राजापत्या त्रिष्टुप्।
स यत् प्राचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒न्मारु॑तं॒ शर्धो॑ भू॒त्वानु॒व्यचल॒न्मनो॑ऽन्ना॒दं कृ॒त्वा ॥१॥
14.2
मन॑सान्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥२॥
14.3
स यद् दक्षि॑णां॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒दिन्द्रो भू॒त्वानु॒व्यऽचल॒द् बल॑मन्ना॒दं कृ॒त्वा ॥३॥
14.4
बले॑नान्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥४॥
14.5
स यत् प्र॒तीचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द् वरु॑णो॒ राजा॑ भू॒त्वानु॒व्यऽचलद॒पोऽन्ना॒दीः कृ॒त्वा ॥५॥
14.6
अ॒द्भिर॑न्ना॒दिभि॒रन्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥६॥
14.7
स यदुदी॑चीं॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द् सोमो॒ राजा॑ भू॒त्वानु॒व्यऽचलत् सप्त॒र्षिभि॑र्हु॒त आहु॑तिमन्ना॒दीं कृ॒त्वा ॥७॥
14.8
आहु॑त्यान्ना॒द्यान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥८॥
14.9
स यद् ध्रु॒वां दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द् विष्णु॑र्भू॒त्वानु॒व्यऽचलद् वि॒राज॑मन्ना॒दीं कृ॒त्वा ॥९॥
14.10
वि॒राजा॑न्ना॒द्यान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥१०॥
14.11
स यत् प॒शूननु॒ व्यच॑लद् रु॒द्रो भू॒त्वानु॒व्यऽचल॒दोष॑धीरन्ना॒दीः कृ॒त्वा ॥११॥
14.12
ओष॑धीभिरन्ना॒दीभि॒रन्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥१२॥
14.13
स यत् पि॒तॄननु॒ व्यच॑लद् य॒मो राजा॑ भू॒त्वानु॒व्यऽचलत् स्वधाका॒रम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा ॥१३॥
14.14
स्व॒धा॒का॒रेणा॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥१४॥
14.15
स यन्म॑नु॒ष्या॒३ननु॒ व्यच॑लद॒ग्निर्भू॒त्वानु॒व्यऽचलत् स्वाहाका॒रम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा ॥१५॥
14.16
स्वा॒हा॒का॒रेणा॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥१६॥
14.17
स यदू॒र्ध्वां दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द् बृह॒स्पति॑र्भू॒त्वानु॒व्यऽचलद् वषट्का॒रम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा ॥१७॥
14.18
व॒ष॒ट्का॒रेणा॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥१८॥
14.19
स यद् दे॒वाननु॒ व्यच॑ल॒दीशा॑नो भू॒त्वानु॒व्यऽचलन्म॒न्युम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा ॥१९॥
14.20
म॒न्युना॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥२०॥
14.21
स यत् प्र॒जा अनु॒ व्यच॑लत् प्र॒जाप॑तिर्भू॒त्वानु॒व्यऽचलत् प्रा॒णम॑न्ना॒दं कृत्वा॑ ॥२१॥
14.22
प्रा॒णेना॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥२२॥
14.23
स यत् सर्वा॑नन्तर्दे॒शाननु॒ व्यच॑लत् परमे॒ष्ठी भू॒त्वानु॒व्यऽचल॒द् ब्रह्मा॑न्ना॒दं कृ॒त्वा ॥२३॥
14.24
ब्रह्म॑णान्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥२४॥