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अथर्ववेद 14.1

स यत् प्राचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒न्मारु॑तं॒ शर्धो॑ भू॒त्वानु॒व्यचल॒न्मनो॑ऽन्ना॒दं कृ॒त्वा ॥१॥

पूरा अध्याय