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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 3.63

पुन॑र्नः पितरो॒ मनो॒ ददा॑तु दैव्यो॒ जनः॑ । जी॒वं व्रात॑ᳪ सचेमहि ॥५॥

पूरा अध्याय