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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 17.13

अ॒व॒तत्य॒ धनु॒ष्ट्वᳪ सह॑स्राक्ष॒ शते॑षुधे । नि॒शीर्य॑ श॒ल्यानां॒ मुखा॑ शि॒वो नः॑ सु॒मना॑ भव ॥१३॥

पूरा अध्याय