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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 17.12

या ते॑ हे॒तिर्मी॑ळहुष्टम॒ हस्ते॑ ब॒भूव॑ ते॒ धनुः॑ । तया॒स्मान्वि॒श्वत॒स्त्वम॑य॒क्ष्मया॒ परि॑ भुज ॥१२॥

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