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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 13.114

आ ते॑ व॒त्सो मनो॑ यमत्पर॒माच्चि॑त्स॒धस्था॑त् । अग्ने॒ त्वां का॑मया गि॒रा ॥१४॥

पूरा अध्याय