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वाल्मीकि रामायण 59.74

रावणो ऽपि महातेजास्तच्छृङ्गं सप्तभिः शरैः ।
आजघान सुतीक्ष्णाग्रैस्तद्विकीर्णं पपात ह ।। ६.५९.७५ ।।।।

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