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वाल्मीकि रामायण 54.34

निमेषान्तरमात्रेण अङ्गदः कपिकुञ्जरः ।
उदतिष्ठत दीप्ताक्षो दण्डाहत इवोरगः ।। ६.५४.३४ ।।।।

पूरा अध्याय