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वाल्मीकि रामायण 53.17

तांस्तु निष्क्रमतो दृष्ट्वा वानरा जितकाशिनः ।
प्रणेदुः सुमहानादान् पूरयंश्च दिशो दश ।। ६.५३.१७ ।।।।

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