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वाल्मीकि रामायण 43.29

निकुम्भस्तु रणे नीलं नीलाञ्जनचयप्रभम् ।
निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः करैर्मेघमिवांशुमान् ।। ६.४३.२९ ।।।।

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