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वाल्मीकि रामायण 43.30

पुनः शरशतेनाथ क्षिप्रहस्तो निशाचरः ।
बिभेद समरे नीलं निकुम्भः प्रजहास च ।। ६.४३.३० ।।।।

पूरा अध्याय