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वाल्मीकि रामायण 32.19

दिवि नक्षत्र भूतस् त्वम् महत् कर्म कृतम् प्रियम् ।
पुण्यम् राज ऋषि वंशम् त्वम् आत्मनः समुपेक्षसे ।। ६-३२-१९।।

पूरा अध्याय