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वाल्मीकि रामायण 101.31

लक्ष्मणाय समुद्दिश्य ज्वलन्तीमिव तेजसा ।
रावणः परमक्रुद्धश्चिक्षेप च ननाद च ।। ६.१०१.३१ ।।

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