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वाल्मीकि रामायण 57.15

स किंचिदनुसंप्राप्तः समालोक्य महागिरिम् ।
महेन्द्रमेघसङ्काशं ननाद हरिपुङ्गवः ।। 5.57.15 ।।।।

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