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वाल्मीकि रामायण 57.14

पर्वतेन्द्रं सुनाभं च समुपस्पृश्य वीर्यवान् ।
ज्यामुक्त इव नाराचो महावेगो ऽभ्युपागतः ।। 5.57.14 ।।।।

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