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वाल्मीकि रामायण 15.24

प्रियम् जनम् अपश्यन्तीम् पश्यन्तीम् राक्षसी गणम् ।
स्व गणेन मृगीम् हीनाम् श्व गण अभिवृताम् इव ॥५-१५-२४॥

पूरा अध्याय