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वाल्मीकि रामायण 1.135

अथोर्ध्वं दूरमुत्प्लुत्य हित्वा शैलमहार्णवौ ।
पितुः पन्थानमास्थाय जगाम विमलेऽम्बरे ॥५-१-१३५॥

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