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वाल्मीकि रामायण 5.28

तीक्ष्णाग्रा ऋजुपर्वाणः स रोषा भुजगा इव ।
तम् अद्य वालिनम् पश्य तीक्ष्णैः आशी विष उपमैः ॥४-५-२८॥

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