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वाल्मीकि रामायण 5.13

हृष्टः सौहृदम् आलम्ब्य पर्यष्वजत पीडितम् ।
ततो हनूमान् संत्यज्य भिक्षु रूपम् अरिन्दमः ॥४-५-१३॥

पूरा अध्याय