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वाल्मीकि रामायण 30.47

सुप्त एक हंसम् कुमुदैः उपेतम्महा ह्रदस्थम् सलिलम् विभाति ।
घनैः विमुक्तम् निशि पूर्ण चन्द्रम्तारा गण कीर्णम् इव अंतरिक्षम् ॥४-३०-४७॥

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