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वाल्मीकि रामायण 30.46

विपक्व शालि प्रसवानि भुक्त्वाप्रहर्षिता सारस चारु पंक्ति ।
नभः समाक्रामति शीघ्र वेगावात अवधूता ग्रथित इव माला ॥४-३०-४६॥

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