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वाल्मीकि रामायण 30.45

रात्रिः शशांक उदित सौम्य वक्त्रातारा गण उन्मीलित चारु नेत्रा ।
ज्योत्स्ना अंशुक प्रावरणा विभातिनारी इव शुक्ल अंशुक संवृत अंगी ॥४-३०-४५॥

पूरा अध्याय