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वाल्मीकि रामायण 30.44

चंचत् चन्द्र कर स्पर्श हर्ष उन्मीलित तारका ।
अहो रागवती संध्या जहाति स्वयम् अंबरम् ॥४-३०-४४॥

पूरा अध्याय