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वाल्मीकि रामायण 28.33

क्वचित् प्रगीता इव षट्पद ओघैःक्वचित् प्रवृत्ता इव नील कण्ठैः ।
क्वचित् प्रमत्ता इव वारण इन्द्रैःविभाति अनेक आश्रयिणो वनान्ता ॥४-२८-३३॥

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