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वाल्मीकि रामायण 28.18

व्यामिश्रितम् सर्ज कदंब पुष्पैःनवम् जलम् पर्वत धातु ताम्रम् ।
मयूर केकाभिः अनुप्रयातम्शैल अपगाः शीघ्रतरम् वहन्ति ॥४-२८-१८॥

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