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वाल्मीकि रामायण 28.17

क्वचित् प्रकाशम् क्वचिद् अप्रकाशम्नभः प्रकीर्णा अंबु धरम् विभाति ।
क्वचित् क्वचित् पर्वत संनिरुद्धम्रूपम् यथा शान्त महार्णवस्य ॥४-२८-१७॥

पूरा अध्याय