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वाल्मीकि रामायण 55.31

तत्र सीते मया सार्धम् विहरस्व यथा सुखम् ।
वदनम् पद्म संकाशम् विमलम् चारु दर्शनम् ॥३-५५-३१॥

पूरा अध्याय