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वाल्मीकि रामायण 45.20

हिंसा विहारा वैदेहि न चिन्तयितुम् अर्हसि ।
लक्ष्मणेन एवम् उक्ता तु क्रुद्धा संरक्त लोचना ॥३-४५-२०॥

पूरा अध्याय