ग्रंथवाल्मीकि रामायणअरण्यकाण्डसर्ग 4242.17वाल्मीकि रामायण 42.17किम्चित् अभ्युन्नत ग्रीव इन्द्रनील निभ उदरः । मधूक निभ पार्श्वः च कंज किंजल्क सम्निभः ॥३-४२-१७॥पिछलाअगलापूरा अध्याय