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वाल्मीकि रामायण 17.10

विशालाक्षम् विरूपाक्षी सुकेशम् ताम्र मूर्धजा ।
प्रियरूपम् विरूपा सा सुस्वरम् भैरव स्वना ॥३-१७-१०॥

पूरा अध्याय