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वाल्मीकि रामायण 97.30

अध्यर्द्धमिक्ष्वाकुचमूर्योजनं पर्वतस्य सा।
पार्श्वे न्यविशदावृत्य गजवाजिरथाकुला ॥ २.९७.३०॥

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