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श्रीरामचरितमानस 15.10

गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं ॥10॥

पूरा अध्याय