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दोहा 47

47.1

चौपाई

प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।।
राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे।।
गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना।।
जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई।।
निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे।।
द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी।।
महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे।।
सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा।।
प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे।।
अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया।।
भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा।।

47.2

दोहा/सोरठा

देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार ॥46॥

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