दोहा 352
352.1
चौपाई
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।।
सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।।
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं।।
भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।।
आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि।।
पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए।।
जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।।
सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना।।
352.2
दोहा/सोरठा
देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।
तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ ॥351॥