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दोहा 347

347.1

चौपाई

मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।।
राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं।।
बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे।।
हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला।।
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा।।
छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए।।
सगुन सुंगध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी।।
रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना।।

347.2

दोहा/सोरठा

कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात।
चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात ॥346॥

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