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दोहा 319

319.1

चौपाई

बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।।
पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा।।
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ।।
कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।।
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा।।
सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।।
कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई।।
करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानी।।

319.2

छंद

को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।
कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली।।
आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई।।
अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई।।

319.3

दोहा/सोरठा

जो सुख भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।
सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु ॥318॥

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