दोहा 306
306.1
चौपाई
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा।।
भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने।।
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं।।
भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना।।
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए।।
दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा।।
अगवानन्ह जब दीखि बराता।उर आनंदु पुलक भर गाता।।
देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।
306.2
दोहा/सोरठा
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल ॥305॥