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दोहा 301

301.1

चौपाई

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं।।
चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी।।
बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना।।
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा।।
मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक।।
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती।।
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा।।
चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई।।

301.2

दोहा/सोरठा

सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर ॥300॥

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