दोहा 250
250.1
चौपाई
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।
सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।।
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।।
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू।।
जग भल कहहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू।।
एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू।।
तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।।
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।
250.2
दोहा/सोरठा
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल ॥249॥