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दोहा 251

251.1

चौपाई

नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।।
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे।।
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।।
त्रिभुवन जय समेत बैदेही।।बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।।
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे।।
परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।।
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं।।
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं।।

251.2

दोहा/सोरठा

तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ ॥250॥

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