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दोहा 145

145.1

चौपाई

करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।।
पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे।।
उर अभिलाष निंरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई।।
अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी।।
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा।।
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।।
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई।।
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा।।

145.2

दोहा/सोरठा

एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार।
संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार ॥144॥

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