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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 3.55

पुन॑र्नः पितरो॒ मनो॒ ददा॑तु दैव्यो॒ जन॑ः । जी॒वं व्रात॑ᳪ सचेमहि ॥५५॥

पूरा अध्याय