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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 20.65

ऋ॒तु॒थेन्द्रो॒ वन॒स्पति॑ः शशमा॒नः प॑रि॒स्रुता॑ । की॒लाल॑म॒श्विभ्यां॒ मधु॑ दु॒हे धे॒नुः सर॑स्वती ॥६५॥

पूरा अध्याय