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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 17.62

दे॒व॒हूर्य॒ज्ञ आ च॑ वक्षत्सुम्न॒हूर्य॒ज्ञ आ च॑ वक्षत् । यक्ष॑द॒ग्निर्दे॒वो दे॒वाँ२ आ च॑ वक्षत् ॥६२॥

पूरा अध्याय