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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 5.31

र॑क्षो॒हणो॑ वलग॒हनः॒ प्रोक्षा॑मि वैष्ण॒वान्र॑क्षो॒हणो॑ वलग॒हनोऽव॑नयामि वैष्ण॒वान् ।
र॑क्षो॒हणो॑ वलग॒हनोऽव॑स्तृणामि वैष्ण॒वान् ॥४॥

पूरा अध्याय